RSS Chief Dr. Mohan Bhagwat Ji Today Message

“जिस देश ने अपने ज्ञान और बुद्धि से वेद, उपनिषद, गीता और शून्य को जन्म दिया हो आज अगर वह अपने लिए योग्य नेतृत्व का भी चयन करने लायक न बचा हो तो इसे समाज का वैचारिक पतन नहीं तो भला और क्या कहियेगा।

देश का प्रधानमंत्री कौन हो या देश का प्रधानमंत्री कैसा हो, महत्वपूर्ण क्या होना चाहिए, आप ही बताएं !

यह निर्णय इतना कठिन भी नहीं जितना आज हमारी वैचारिक दुर्बलता ने इसे बना दिया है; व्यवहारिकता विवेक पर हावी जो है !

किसी भी निर्णय के सही होने के लिए उसके आधार का सही होना आवश्यक है अन्यथा निष्कर्ष निर्णयकर्ता के भ्रमित प्राथमिकताओं को ही प्रतिबिंबित करता है ; जब से सत्ता के स्वार्थ ने राजनीती को राष्ट्रहित से भी अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है, राष्ट्र के नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण दाइत्व के लिए भी पात्र का चयन योग्यता के बदले लोकप्रियता के आधार पर किया जाने लगा; परिणाम प्रत्यक्ष है !

जब तक समाज के लिए महत्व तुलनात्मक दृष्टिकोण पर आधारित रहेगा, समाज का सर्वांगीण विकास असंभव है। आखिर, तुलनात्मक दृष्टिकोण द्वारा निर्धारित महत्व को अपनी विशेषता सिद्ध करने के लिए मापदंड के स्तर में किसी न किसी को हीन दर्शाना अनिवार्य है और यही इस प्रक्रिया की सीमितता है !

कला समभवनाओं के लिए आवश्यक है, ज्ञान जिज्ञासा को सार्थक बनाता है और गलतियों की सीख अनुभव का महत्व; ऐसे में, सामान्यकरण की प्रक्रिया और प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत विशिष्टता को स्वाभाविक रूप से अर्थ हीन बना देती है।

प्रकृति ने सभी को सामान्य रूप से विशिष्ट बनाया है, ऐसे में, व्यक्तिगत विशिष्टता की अनभिज्ञता ही लोगों को महत्व के लिए एक दूसरे का प्रतियोगी बना देती है !

अगर महत्व के लिए स्पर्धा के बजाये समाज के संपूर्णता के प्रति व्यक्तिगत योगदान को आधार बनाया जाये तो निसंदेह हम एक विशिष्ट, समृद्ध व् आदर्श समाज की स्थापना कर सकेंगे !

महत्व कर्म का होना चाहिए क्योंकि किसी भी पठकथा के सन्दर्भ में भी नायक का पात्र उसके भूमिका का चरित्र निर्धारित करता है; राष्ट्र के नेतृत्व का दाइत्व भी उतना ही विशेष है क्योंकि उसका प्रभाव समाज के वर्त्तमान और भविष्य पर भी पड़ता है , ऐसे में, यदि नेतृत्व के लिए पात्र के चयन का आधार ही गलत हो तो निष्कर्ष तो कभी सही हो ही नहीं सकता।

किसी भी राष्ट्र के नेतृत्व का स्तर और उसकी दशा में सीधा सम्बन्ध होता है। इसलिए, यदि किसी राष्ट्र को अपनी सामाजिक दशा बदलनी हो तो प्रयास की शुरुआत सर्वप्रथम उसे अपने नेतृत्व के स्तर में सुधार से करनी होगी क्योंकि जब राष्ट्र के नेतृत्व की सोच, समझ और मानसिकता ही कुंठित हो तो स्वाभाविक है की उसके विकास की समझ भ्रमित और उद्देश्य अस्पष्ट होगा जिससे न केवल देश के प्रयास की दिशा का गलत होना स्वाभाविक है बल्कि अनमोल अवसर की व्यर्थता भी निश्चित है;

ऐसी परिस्थिति में किसी भी जागृत समाज में राष्ट्रवाद से ओत- प्रोत समाज की संगठित शक्ति को क्या करना चाहिए, आप ही बताएं !!”

Source: Facebook

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